Skip to main content

रिश्तों का दूसरा नाम ही समझौतें करना है - अघोरी अमली सिंह




                                         
                          रिश्तों का दूसरा नाम ही समझौतें करना है
                             बहुत कुछ त्याग करना पड़ता है
                                   इनको पाने के लिए
                          सहमे हुए दिल को समझाना पड़ता है
                           आँखों के पानी को छुपाना पड़ता है
                                  हर गम भूलना पड़ता है
                            कदम से कदम मिलाने के लिए
                                इस दवाखाने में दवाई नहीं
                                 मुस्कान मिलती है  साहब
                           जो  दिल को  राहत देती जाती है
                                  जिंदगी जीने के लिए
                      कहे अघोरी अमली  वो रिश्ते रिश्ते नहीं जहॉ
                               सम्पति धन का मोह घनघोर हो
                                उनको ध्वस्त करना ही जरुरी है
                              कीचड़ मे कमल खिलाने के लिए
               दरारों को भर खुशियों से भरा एक आसमान सजाने के लिए
                            रिश्तों का दूसरा नाम ही  समझौतें करना है
                                बहुत कुछ त्याग करना पड़ता है
                                     इनको पाने के लिए

                                   अघोरी अमली सिंह 

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

शीर्षक - खानाबदोशी - अघोरी अमली सिंह

     शीर्षक - खानाबदोशी एक जगह ज्यादा रूका नहीं जाता  यह दिल अब खानाबदोश हो गया है हर किसी पर फिसलता नही है फिर भी ना जाने किस आस ने दिल और दिमाग में बवंडर मचा रखा गावों से शहर शहर से गांव पंगडडी के रास्ते से रेलमार्ग के रास्ते तक घूमता रहता है, गिले में शिकवे में खुद से ही गुफ्तगू करता है यह दिल अब खानाबदोश हो गया है एक जगह ज्यादा रूकता नहीं जाता पत्रकारिता मे डिग्री की है पर खोजी पत्रकार नहीं मेरे ऊपर किसी कंपनी का कोई अधिकार नहीं आज यहाँ हूँ कल वहाँ परसों का कोई ठिकाना नहीं अगर यह दुनिया बेगानी है पर मैं अब्ब्दुला दीवाना नहीं खोजी नहीं पत्रकार नहीं मन मौजी कह देना क्योंकि एक जगह ज्यादा रूका नहीं जाता  यह दिल अब खानाबदोश हो गया है लेखक - अघोरी अमली सिंह #amliphilosphy

एक खत भाई को

शीर्षक - एक खत भाई को  तुमको पता है भाई एक साल बीतने को है जख्म अभी भी भरा नहीं कभी भरेंगा भी नहीं दिमाग सब समझता है बीता वक्त वापिस नहीं आयेगा परंतु  इस पापी दिल को कुछ समझ में नहीं आता है  वो हर खुशी और गम में तुमको याद करता है  क्योंकि तुम दिल में हो और दिल जब तलक धड़कता रहेगा तुम याद आते रहोगे कभी कभी बहुत ज्यादा नाराजगी खुद से भी होती है  ऐसा समय आ कैसे गया हो कैसे गया एक बार कुछ कहा तो  होता पर फिर हो सकता है  कुछ कहना चाहते हो पर कह ना सके या कहा तो हम समझ ना सके यह प्रश्नोत्तर दिमाग को झकड लेते हैं अक्सर जब भी घर जाना होता है तब तक तो सब ठीक रहता है जैसे ही तुम्हारे घर तरफ नजर जाती है यहीं सब बातें यादें दिमाग को जकड़ लेतीं हैं फिर ना जाने क्यों लगता है तुम्हारा तुरंत काॅल आयेगा,  आओ भाई कही चलते हैं घूमते हैं चर्चा करते हैं तुम ही तो कहते हो ना कि भाई तुम कुछ करते क्यों नहीं हो तुम आगे बढ़ो अच्छा लगता है, भाई कसम से जिस दिन रफ्तार भाई जी के साथ शो किया था उस समय यही दिल बोल रहा था भाई यह शो तेरे लिए है आने ...

प्यार का मानसून सत्र भाग -१

आज की शाम  ठंडी ठंडी हवा चल रही थी  मैंने अपनी कुछ  किताबों  को टेबल पर रख  किताब के पनो को पलटना शुरू कर दिया  दिमाग का जंग धीरे धीरे साफ़ हो  रहा  था  की  अचानक तेज़ हवा के झोंके के  साथ  बारिश की बूंदो ने कमरे मे दस्तक दी  खिड़की की और बढ़ा  तो  लगा यह मानसून  धरती की  तपिस  मिटा  रहा है  पहाड़ों पर बिजली का चमकना सोने पे सुहागा सा प्रतीत हो रहा है  जैसे ही  तुम अपनी छत पर आ कर  बरसात का लुफ्त उठा रही  हो  ऐसा लग रहा जैसे किसी ने खाली पड़े गिलास को  शराब से भर दिया हो  नशा तुम्हारा इन  घने बादलों को दिल  खोल  के बरसने को मजबूर कर रहा हो  मानों देवलोक से कोई  उपहार तुम्हरे लिए आ रहा  हो       तुम्हरे कदम मेरी छत की ओर बढ़ना  कुछ अनसुलझे प्रश्नों के जवाव से महसूस हो रहे है  यह भीगा हुआ जिस्म भीषण बाणो सा  दिल पे प्रहार कर रहा है  तुम जो स्पर्श दर स्पर्श  कर  रह...